*꧁‼️सत्य सनातन धर्म की जय‼️꧂**असतो मा सद्गमय।**तमसो मा ज्योतिर्गमय।**मृत्योर्मा अमृतं गमय।*यह अत्यंत लोकप्रिय और प्रेरणादायक मंत्र वेदों के अंतर्गत *बृहदारण्यक उपनिषद* (1.3.28) से लिया गया है।*विस्तृत भावार्थ*यह मंत्र किसी स्वार्थी या भौतिक कामना का नहीं, बल्कि मनुष्य की आत्मा की सबसे गहरी और पवित्र पुकार है। यह अज्ञानता के

अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश की ओर यात्रा करने की प्रार्थना है: 1. *असतो मा सद्गमय (असत से सत की ओर):** *भाव:* मनुष्य जीवन में अक्सर भ्रम, कपट, और असत्य के मार्ग पर भटक जाता है। यह प्रार्थना बताती है कि हे ईश्वर! मुझे झूठ, दिखावे और क्षणिक प्रलोभनों (असत्) से निकालकर शाश्वत सत्य, सदाचार और वास्तविकता (सत्) की ओर ले चलिए। 2. *तमसो मा ज्योतिर्गमय (तमस से ज्योति की ओर):** *भाव:* अंधकार अज्ञान, मूर्खता, और नकारात्मकता का प्रतीक है। प्रकाश ज्ञान, चेतना और समझ का प्रतीक है। इस पंक्ति का भाव है कि मेरे भीतर के अज्ञान और भ्रम के अंधकार को दूर कीजिए और मेरे अंतःकरण को आत्मज्ञान के प्रकाश से आलोकित कर दीजिए। 3. *मृत्योर्मा अमृतं गमय (मृत्यु से अमरत्व की ओर):** *भाव:* यह भौतिक शरीर नश्वर है और मृत्यु अटल है, परंतु मनुष्य की आत्मा अमर है। यहाँ ‘मृत्यु’ केवल शारीरिक मौत नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक मृत्यु (अज्ञान और विकारों में डूबना) भी है। ‘अमृत’ से तात्पर्य उस परम शांति, मोक्ष और अमर चेतना से है जो जन्म-मृत्यु के चक्र से परे है। मुझे उस अमरता का अनुभव कराइए।यह मंत्र संपूर्ण रूप से *परिवर्तन और आत्म-विकास* का मार्ग दिखाता है। यह मनुष्य को यह याद दिलाता है कि उसका वास्तविक स्वरूप पवित्र है, और उसे जीवन में अज्ञान से ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिए।*꧁‼️जय राम जी की ‼️꧂*Follow the *‼️सनातन हंस प्रवाह‼️* channel on WhatsApp: https://whatsapp.com/channel/0029VbB6Tv3G3R3rOeOdEW2b