सृजन 166 ( 08 फरवरी 2026)विशाखापटनम की संस्था सृजन की ऑनलाइन काव्य साहित्य चर्चा संपन्नजो उद्वेलित करे सोच को वही सच्ची कविता है

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विशाखापटनम की हिंदी साहित्य संस्था सृजन ने अपने 166 वें कार्यक्रम के रूप में सदस्यों की काव्य रचनाओं पर साहित्य चर्चा का ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजन किया। सृजन के रचनाकारों ने विविध विषयों पर अपनी अपनी कविताएं प्रस्तुत की जिस पर सदस्यों द्वारा विस्तृत चर्चा की गई। इस मासिक साहित्य कार्यक्रम में डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन ने आयोजन के विषय में चर्चा की। उन्होंने कहा जो उद्वेलित करे सोच को वही सच्ची कविता है। कविता कम शब्दों में बहुत कुछ प्रभावी ढंग से कह देती है। भावनाओं और संवेदनाओं को कम शब्दों में लिखी कविता ही प्रभावी और सही कविता है, जो काफी समय तक हमारे मन मस्तिष्क में अपनी उपस्थिती दर्ज़ करती है।
कार्यक्रम का आरंभ डॉ के अनीता के स्वागत भाषण से हुआ। उन्होंने सभी उपस्थित रचनाकारों का स्वगत किया और कहा सृजन संस्था केवल काव्य-पाठ और विमर्श का मंच नहीं, बल्कि वह सृजनात्मक यात्रा है जहाँ शब्दों को संस्कार मिलते हैं, विचारों को दिशा मिलती है और साहित्य सामाजिक उत्तरदायित्व का स्वरूप ग्रहण करता है। इस मंच से अनेक रचनाकार साहित्य के मूल्यों को आत्मसात करते हुए संवेदनशील समाज के निर्माण में अपना सृजनात्मक योगदान दे रहे हैं।
कार्यक्रम का संचालन एल चिरंजीव राव ने अपनी रुबाइयों और कविताओं से रचनाकारों को आम्न्तृत करते हुये सफलतापूर्वक किया। कार्यक्रम की शुरुआत हुई सरस्वती वंदना श्लोक से जिसे प्रस्तुत किया भारती शर्मा ने।
सबसे पहले एसवीआर नायडू (हैदराबाद) ने रचना “काले को अशुभ समझते हैं हम” सुनाई जिसमें रंगों पर मानवीय सोच को सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया। डॉ एम विजयगोपाल (विशाखापटनम) ने “विकसित भारत” में भारत की पूर्व और वर्तमान स्थितियों की तुलना करते हुये बेहतर कल की आशा कविता के माध्यसे बखूबी प्रस्तुत किया। वीरेंद्र राय (चंडीगढ़, पंजाब) रूमानी विरह के दर्द को समेतती प्रभावी “ग़ज़ल” सुनाई रो दिया मैं बहुत मुस्कुराने के बाद, कुछ भी नहीं बचा उसके जाने के बाद। मीना गुप्ता (बेंगलूरु) ने शहर के महलों और झुग्गी झोपड़ियों के बीच संवेदनात्मक तुलना की कविता “बस्तियों का दर्द” सुनाई। भारती शर्मा (विशाखापटनम) ने मार्मिक और संवेदनशील कविता जिसमें मां के चले जाने के बाद बेटी के मन:स्थिति को रचना “बहुत याद आती है अम्मा! तुम्हारी” प्रस्तुत किया।
डॉ के अनीता (विशाखापटनम) ने परिवार और अकेले होते मानवीय सम्बन्धों पर गहन चिंतन करती रचना “रिश्तों का आंगन” प्रस्तुत की जो आज के समय की मांग है। डॉ वंदना काले (रायपुर छतीसगढ़) ने आज के जमाने के तौर तरीकों को अपना कर कुछ नया करने की लालसा में प्रौढ़ा के अंतर्मन की सोच को सुंदर कविता “आज मुझे भी नया करना है” में प्रभावी ढंग से सुनाया। सृजन के आधार बने जीवन चिंतन और गहन सोच को रेखांकित करती कविता “तिनका तिनका मैं संजोती” को भावपूर्ण प्रस्तुत किया डॉ शकुंतला बेहुरा (भूबनेश्वर, ओड़ीशा) ने। सृजन के सचिव डॉ टी महादेव राव (विशाखापटनम) ने अपनी कविता, “प्रसव कराना है नई कविता का”, जिसमें समय की विडम्बनाओं और स्थितियों में उद्वेलित करती भावनाओं का समावेश था, सुनाई। वर्तमान समय के जीवन संघर्ष की कविता “याद आती है मुझे उस निशा की” सरल सहज शब्दों में सुनाई पारस नाथ यादव (भरूच, गुजरात) ने। जयप्रकाश झा (दुर्गापुर पश्चिम बंगाल) ने कविता “स्नेह बंधन के सब साथी” में सृजन के सूत्रों में बंधे सारे साथियों की संस्था सृजन पर अपनी छोटी लेकिन मार्मिक रचना प्रस्तुत की। रामप्रसाद यादव ने शृंगारी अनुभूतियों को संजोती मन को हरती कविता “घर आना” प्रास्तुत की किस्में गांव के गृहिणी के चेष्टाओं का सुंदर समावेश था। वर्तमान स्थितियों में बेटियों पर के अत्याचार और हमारे व्यवहार पर “बताओ तुम क्या हो?” और प्रतीकों के माध्यम से मानवीय सोच पर “अलग सी चाल” कवितायें एल चिरंजीव राव (इच्छापुरम) ने पढ़ीं।

सारी रचनाओं पर चर्चा हुई और सभी ने काव्य साहित्य चर्चा को उपयोगी, प्रेरणास्पद और स्तरीय लेखन का उदाहरण बताया और कहा इस तरह के कार्यक्रमों से लिखने की प्रेरणा और उत्साह मिलता है। कार्यक्रम के अंत में जयप्रकाश झा ने सारी प्रस्तुतियों पर विश्लेषणात्मक समीक्षा की और उपस्थित सभी का आभार माना। इस मासिक बैठकों की शृंखला में अगला कार्यक्रम मार्च आठ को किए जाने की सूचना दी गई।

डॉ टी महादेव राव, सचिव सृजन , विशाखापटनम

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