बहराणा साहिब की संख्या नहीं, भावना और मर्यादा महत्वपूर्ण: महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी

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( कुछ समाज में ऐसे भी लोग हैं धर्म चर्चा के बजाय सोशल मीडिया पर सच कहने वालों के मां-बाप तक को अब शब्द कहते हैं, उन्हें धर्म की वार्ता नहीं करनी है )

बहराणा साहिब की संख्या नहीं, भावना और मर्यादा महत्वपूर्ण: महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी

बहराणा साहिब की संख्या नहीं, भावना और मर्यादा महत्वपूर्ण: महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी

राजस्थान :- भीलवाड़ा सिंधी पंचायत के शपथ ग्रहण समारोह में समाज को दिखावे और व्यवसायीकरण से बचने का दिया संदेश
भीलवाड़ा। भीलवाड़ा सिंधी पंचायत के शपथ ग्रहण समारोह के पावन अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी ने सिंधी समाज की धार्मिक परंपराओं, सनातन संस्कृति और सामाजिक आयोजनों में बढ़ते दिखावे को लेकर गंभीर चिंतन व्यक्त किया। उन्होंने समाजजनों से धार्मिक आयोजनों की संख्या और बाहरी आडंबर के बजाय उनकी मूल भावना, पवित्रता एवं मर्यादा को महत्व देने का आह्वान किया।
अपने प्रेरणादायी एवं मार्गदर्शक उद्बोधन में स्वामी हंसराम जी ने कहा कि वर्तमान समय में केवल देखादेखी के कारण बहराणा साहिब की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कहीं 101, कहीं 250, 1100 तो कहीं 2100 तक बहराणा साहिब किए जा रहे हैं। संख्या बढ़ना अपने आप में उद्देश्य नहीं होना चाहिए, बल्कि इसके पीछे की श्रद्धा और धार्मिक भावना सबसे महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि बहराणा साहिब की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उसकी पूजन पद्धति, आवश्यक सामग्री और धार्मिक विधि-विधान पर भी समाज को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। धार्मिक परंपराओं को केवल आयोजन और प्रदर्शन तक सीमित करने के बजाय उनके मूल स्वरूप को समझना आवश्यक है।
विसर्जन की मर्यादा का भी रखें ध्यान
महामंडलेश्वर स्वामी हंसराम जी ने बहराणा साहिब के विसर्जन के दौरान धार्मिक मर्यादाओं और परंपरागत नियमों के पालन पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा के साथ लापरवाही अथवा अनदेखी समाज की सांस्कृतिक विरासत को प्रभावित कर सकती है।
धार्मिक आयोजनों के व्यवसायीकरण पर चिंता
स्वामी हंसराम जी ने धार्मिक आयोजनों में बढ़ते व्यवसायीकरण पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि धर्म और आध्यात्म के आयोजन श्रद्धा, सेवा और संस्कार के केंद्र होने चाहिए, न कि केवल दिखावे और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के।
उन्होंने समाज को बाहरी चकाचौंध और आडंबर की अंधी दौड़ से बचने की सलाह दी। उनका कहना था कि यदि समाज अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से दूर होता गया तो आने वाली पीढ़ियों के सामने परंपराओं का वास्तविक स्वरूप कमजोर पड़ सकता है।
‘क्वांटिटी नहीं, क्वालिटी पर दें ध्यान’
स्वामी हंसराम जी के उद्बोधन का मूल संदेश यही रहा कि समाज को संख्यात्मक प्रदर्शन (Quantity) से हटकर धार्मिक गुणवत्ता (Quality), आंतरिक शुद्धता, श्रद्धा और परंपराओं की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने सिंधी समाज से अपनी सनातन एवं सांस्कृतिक परंपराओं को सही स्वरूप में आगे बढ़ाने और धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने का आह्वान किया।
उनका यह उद्बोधन समाज के लिए आत्मचिंतन, सुधार और अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौटने का संदेश लेकर आया। शपथ ग्रहण समारोह में उपस्थित समाजजनों ने उनके विचारों को गंभीरता से सुना और धार्मिक परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर मंथन किया।

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